Wednesday, March 27, 2013

मां






पीपल के पत्तों के
खड़खड़ाने से 
एहसास होता है अगणित पातों से 
टुकुर टुकुर ताक रही हो 
तुम मां 

तुम्हारी हंसी ही तो है 
नन्हे शिशु के 
रक्ताभ होंठों पर 
और खनकती है 
कानों में मेरे जहाँ जाता हूँ 

तुम कहाँ ओझल हुई 
मेरी आँखों से 
अब भी जब कोई छोटा सा तारा 
चाँद के किनारे पर दीख जाता है 
याद आता है बचपन 
तुम्हारी चांदनी के साये ही में 
मैंने चलना सीखा मां 
रातों के डरावने जंगल में 

तुम्हारे होने का एहसास 
बना रहता है मां 
और मुझे कभी हारने नहीं देता 
तुम्हारी पौरुष से भरी आँखें
 ही तो हैं 
सजी हैं मेरे माथे पर
और हरदम बेहिचक 
किसी भी कठिन समय का 
सामना करने को तैयार रखती है 

मौसम बदलते हैं 
पतझड़ से सावन 
सर्द रातों से लू भरी दोपहर तक
तुम्हारी प्रार्थनाओं की बुदबुदाहट 
मुझे सुरक्षित रखती है 
मैंने तुम्हें खोया नहीं मां 
मैंने पाया है तुम्हें 
तुम्हारे ही अनंत रूपों में 
अनंत आकाश की 
अनंत गहराइयों में   

चकित हूँ मैं 
रोशनी का समुद्र है 
मां 
तुम्हारे तेजोमय रूप की चकाचौंध में 
मेरी आँखें नहीं खुल रही हैं 
और मैं तुम्हें प्रणाम करने को 
किसी ओर शीश भी नहीं झुका सकता 
नमन है तुम्हें मां 
आत्मा की अनंत गहराइयों से 
दिशाओं के दशोद्वारों  के पार तक।



शैलेन्द्र तिवारी 

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