Saturday, November 16, 2013

माया नगरी











हो सकता है 
मिट्टी में ही 
छुपी हो खुशबू 
सारे फूलों की 
ऐसा भी हो सकता है 
कि आकाश ही 
अपने दुशाले में बाँध 
जीवन के सारे टुकड़े 
हमारे भीतर आकर 
फैल गया हो 
संभव है 
कि समुद्र ही उफनता हो 
ज्वार भाटे सा हमारे भीतर 
और बाहर 
अपनी निस्सीम अनंतता 
समेटे चुपचाप खड़ा हो 
या फिर 
कुहराए प्रकाश कण ही 
बना रहे हों यह अंधियारा
इस माया नगरी में 
सब कुछ सम्भव है 
असम्भव कुछ भी नहीं 
हो सकता है 
प्रेम भी सदियों पुरानी 
किसी पथराली चट्टान पर 
खुदा कोई नाम भर हो  
जिसकी लिपि अभी खोजी 
जानी है। 



3 जुलाई 2000,
भोपाल 

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